Prominent Gathering Calls for National Unity Against Communalism:

Prominent Gathering Calls for National Unity Against Communalism: 

Intellectuals and Social Leaders Unite at Jamiat Umami-i-Hind Event

New Delhi, August 19, 2023: A significant gathering of eminent intellectuals and social leaders from across the nation convened today at the Madani Hall of the Jamiat Ulama-i-Hind headquarters in New Delhi presided over by Maulana Mahmood Asa’d Madani, President of Jamiat Ulama-i-Hind, the event aimed to discuss the challenge of communalism, social division and strategies to counter it. Participants unanimously stressed the necessity for collaborative ground-level efforts to counteract this divisive trend.

While acknowledging that the majority of the country favors unity and harmony, the gathering recognized that positive voices have either remained silent or struggled to reach the masses. Consequently, those advocating for a polarizing agenda appear more influential than they truly are. The reality, however, stands in contrast to this perception. Thus, the collective call emerged for the broader society to actively engage, renouncing silence in favor of a concerted effort to safeguard India's unity and inherent diversity.

In his opening statement, Maulana Mahmood Asa’d Madani, President of Jamiat Ulama-i- Hind, extended a warm welcome to the intellectuals and social leaders. He raised pertinent questions about the alarming trend of religion-based hatred perpetuated against a particular community. Highlighting the historical commitment of Jamiat Ulama-i-Hind to national unity, he emphasized the need for ongoing dialogue and collaboration to weave together the threads of the nation's diverse fabric.

Renowned social thinker Mr. Vijay Pratap, while sharing his perspective, underscored the importance of dialogue (Sanwad). He lauded the meaningful contributions of Jamiat Ulema-i-Hind, highlighting that their sacrifices have left a lasting impact. Notably, even within a sectarian context of partition, India's constitution was crafted on the bedrock of secularism. The nation served as a fertile ground for the growth of Islamic ideas and intellectual thoughts, nurturing remarkable Islamic thinkers whose absence from the discourse would render any discussion of global Islam incomplete. Moreover, Muslims, akin to their fellow citizens, play a substantial role in the nation's progress. Thus, there's no need for despondency in the face of current challenges. Such situations are universal and a testament to a nation's resilience and sagacity. India, with its remarkable ability to adapt, stands as a living testament to this principle.

Addressing the audience, Economist Professor Arun Kumar emphasized that the propagation of right-wing ideologies thrives on the backdrop of economic inequality in the nation. He stated that the government's assertion of over 130 million people having transcended the poverty threshold is entirely without merit.

Prominent Supreme Court Senior lawyer Sanjay Hegde noted the current precarious time, emphasizing the importance of upholding and defending the Constitution against those who seek to undermine it. He stressed that the Constitution must be practiced in its true spirit and conveyed to those working against its principles.

Dr. Saurabh Bajpai, a historian at Delhi University, addressed the gathering in the second session, lauding Jamiat Ulama-i-Hind's historical stance against partition. He highlighted that the majority of Indian Muslims opposed the partition, aligning themselves with the broader Indian identity rather than divisive ideologies. He emphasized that meaningful dialogue requires ideological clarity from all sides.

Renowned Author Ms. Rajni Bakshi advocated for non-violence as a response to the prevailing situation. She emphasized that non-violence doesn't mean acquiescence to injustice but calls for finding goodness in everyone and cultivating self-awareness.

Mr. Ramashankar Singh, Founder Chancellor of ITM University Gwalior, urged the formation of a unified federation across social classes to combat present challenges. He called for the dissemination of messages from saints, sufis, and freedom fighters to the new generations, countering the organized efforts of divisive elements.

Christian leader John Dayal highlighted the growing sectarianism and oppression of minorities, emphasizing that the constitutional rights of minorities must be protected, rendering dialogue futile if these rights are eroded.

Sardar Daya Singh, a member of Sikh International Forum, pledged support for the Muslim community while standing against oppression as a whole.

The event concluded with heartfelt vote of thanks from General Secretary Jamiat Ulama-i-Hind Maulana Hakeemuddin Qasmi and warm hospitality extended by Ovais Sultan Khan and Maulana Mehdi Hasan Aini Deoband.

This gathering of perspectives exemplified a unified call against communalism, emphasizing the importance of dialogue, historical resilience, and collective efforts to safeguard India's pluralistic ethos.

Noteworthy attendees included Dr. Indu Prakash Singh, Vijay Mahajan, Prof. Ritu Priya JNU, Prof. MMJ Warsi Aligarh Muslim University, Dr. Lenin Raghuvanshi Founder PVCHR, Kailash Meena RTI Activist, Bhai Tej Singh, Tabssum Fatima, Mritunjai Singh Researcher, Pushpa Raj Deshpande, Father Nicholas, Jayant Jagiyasuji, Anupam Ji, Avi Kathpalia, Harish Mishra Banaraswale, Dr. Heera Lal MLA, Father Nicholas Barala, Mohanlal Panda, Advocate Satish Timta, Father Vijay Kumar Naik, and Abhishek Shrivastav.


साम्प्रदायिकता के विरुद्ध देश के बहुसंख्यक वर्ग को खड़ा होना होगा

- जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी के निमंत्रण पर देश के बुद्धिजीवियों, राजनीतिक और धार्मिक नेताओं की एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी आयोजित

नई दिल्ली, 19 अगस्त 2023। “वर्तमान परिस्थिति पर आपसी संवाद“ के शीर्षक से शनिवार को एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी जमीअत उलेमा हिन्द, नई दिल्ली के प्रधान कार्यालय के मदनी हॉल में आयोजित की गई, जिसमें समाज के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ी हस्तियों, अर्थशास्त्रियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विचारकों और प्रोफेसरों ने भाग लिया। संगोष्ठी में देश के सामने मौजूद साम्प्रदायिकता की चुनौती, सामाजिक ताने-बाने के बिखराव और इसके रोकथाम के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा की गई और जमीनी स्तर पर काम करने और संवाद की आवश्यकता पर सहमति व्यक्त की गई। सभी बुद्धिजीवियों ने माना कि साम्प्रदायिकता इस देश के स्वभाव से मेल नहीं खाती और न ही मातृभूमि के अधिकांश लोग ऐसी सोच के पक्षधर हैं, लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जो लोग सकारात्मक सोच के समर्थक हैं, उन्होंने या तो खामोशी की चादर ओढ़ ली है या उनकी बात समाज के अंतिम भाग तक नहीं पहुंच पा रही है, जिसकी वजह से जो लोग देश के सामाजिक ढांचे को बदल देना चाहते हैं या नफरत की दीवार खड़ी करके अपनी राष्ट्रविरोधी विचारधारा को सफल बनाना चाहते हैं, वह जाहिरी तौर पर हावी होते नजर आ रहे हैं। हालांकि यह वास्तविकता नहीं है। इसलिए समाज के बहुसंख्यक वर्ग को मौन रहने के बजाय कर्मक्षेत्र में आना होगा और भारत की महानता एवं उसके स्वाभाविक अस्तित्व को बचाने के लिए एकजुट एवं सर्वसम्मत लड़ाई लड़नी होगी।

अपने उद्घाटन भाषण में जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष और कार्यक्रम के सूत्रधार मौलाना महमूद असद मदनी ने बुद्धिजीवियों का स्वागत करते हुए सवाल किया कि ऐसी स्थिति में जब देश के एक बड़े अल्पसंख्यक वर्ग को उसके धर्म और आस्था की वजह से निराश करने या अलग-थलग करने की कोशिश की जा रही है, हमें इसके समाधान के लिए क्या आवश्यक कदम उठाने चाहिएं? मौलाना मदनी ने कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद के बुजुर्गों ने गत सौ वर्षों से आधिकारिक तौर पर और दो वर्षों से अनौपचारिक रूप से देश को एकजुट करने की कोशिश की और देश की महानता को अपनी जान से ज्यादा प्रिय बनाया। जब देश के विभाजन की नींव रखी गई तो हमारे पूर्वजों ने अपनों से मुकाबला किया। देश के लिए अपमान सहा और आजादी के बाद राष्ट्रीय एकता के लिए अपने बलिदानों की अमिट छाप छोड़ी और तमाम कठिनाइयों के बावजूद हम आज तक अपनी डगर से हटे नहीं हैं। वर्तमान स्थिति में भी हम संवाद के पक्ष में हैं, हमारी राय है कि सबके साथ संवाद होना चाहिए और एक ऐसा संयुक्त अभियान चलना चाहिए कि देश का हर धागा एक-दूसरे से जुड़ जाए।
सुप्रसिद्ध सामाजिक विचारक विजय प्रताप ने अपने विचार व्यक्त करते हुए आपसी संवाद पर जोर देते हुए कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद ने जो बलिदान दिए हैं, वह व्यर्थ नहीं गए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि भारत के विभाजन के अत्यंत साम्प्रदायिक वातावरण के बावजूद देश का संविधान धर्मनिरपेक्ष आधार पर बनाया गया। इस्लामिक शिक्षाओं और विचारों का जो विकास भारत में हुआ, बड़े-बड़े इस्लामी विचारक यहां जन्मे, जिनके उल्लेख के बिना वैश्विक स्तर पर इस्लाम का जिक्र अधूरा और अपूर्ण है। इसके अलावा देश के विकास के जितने विषय हैं, उनमें मुसलमानों की देश के अन्य लोगों की तरह बड़ी भूमिका है। इसलिए हमें वर्तमान परिस्थितियों से निराश होने की जरूरत नहीं है, हर समुदाय के साथ ऐसी स्थितियां होती हैं और जो समुदाय जागरूकता का परिचय देता है, वह हालात से निपटने में सक्षम होता है।
अर्थशास्त्री प्रो. अरुण कुमार ने कहा कि देश में आर्थिक असमानता के कारण दक्षिणपंथी तत्वों को अपने विचारों को बढ़ावा देने का मौका मिल जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार ने जो दावा किया है कि 13 करोड़ से अधिक लोग गरीबी रेखा से ऊपर उठ गए हैं, यह पूरी तरह से निराधार है। असंगठित क्षेत्र के 94 प्रतिशत से अधिक लोग दस हजार से कम मासिक वेतन पाते हैं, जो गरीबी रेखा से कभी नहीं उबर सकते।

सुप्रीम कोर्ट के जाने-माने वकील संजय हेगड़े ने कहा कि हम एक अजीब दौर में हैं, आज लोग संविधान को बदलने की बात कर रहे हैं, इसलिए जरूरी है कि संविधान की रक्षा की जाए और यह तभी संभव है जब हम संविधान को सही अर्थों में लागू करें और संविधान को समाप्त करने वालों को यह संदेश दें।
दूसरे सत्र में स्थिति के समाधान पर अपने विचार प्रस्तुत करते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास के प्रो. डॉ. सौरभ बाजपेयी ने कहा कि मुझे इतिहास के अध्ययन के दौरान जिन संस्थानों पर गर्व महसूस हुआ, उनमें से एक जमिअत उलमा-ए-हिंद भी है। इस संस्था के नेता हजरत मौलाना हुसैन अहमद मदनी ने पाकिस्तान बनने का विरोध किया। उनके साथ इस देश के अधिकांश मुसलमान थे। यह बात सत्य से परे है कि 90 प्रतिशन मुसलमानों ने मुस्लिम लीग को वोट दिया। वह आम मुसलमाना नहीं थे, बल्कि सामंत मुसलमान थे, जिनको ही वोट देने का अधिकार था। दिल्ली की जामा मस्जिद के पास पाकिस्तान समर्थकों और विरोधियों की एक सभा हुई। समर्थन करने वालों की सभा में केवल पांच सौ लोग थे और जो विरोधी थे, जिनका नेतृत्व जमीअत उलमा कर रही थी, उनकी सभा में दस हजार की भीड़ थी। उन्होंने कहा कि जो कौम अपना इतिहास भुला देती है, वह खुद को मिटा देती है। भारत के अधिकांश मुसलमानों ने विभाजन का विरोध किया था, यह एक इतिहास है। एक तरफ केवल मुस्लिम लीग थी तो दूसरी तरफ जमीअत उलमा के साथ 19 मुस्लिम संगठन थे। इसलिए देश पर मुसलमानों का अधिकार उतना ही है जितना किसी और का। उन्होंने कहा कि आपसी संवाद तभी सफल होगा जब दोनों पक्ष अपनी विचारधारा और सोचने का तरीका सही कर लें।
सुप्रसिद्ध लेखिका रजनी बख्शी ने मौजूदा हालात में गांधीवादी अहिंसा आंदोलन की वकालत की और कहा कि अहिंसा का मतलब अत्याचार के खिलाफ चुप रहना नहीं है और न ही इसके लिए किसी को महात्मा बनने की जरूरत है, बल्कि हमें बुरे से बुरे लोगों में भी अच्छाई का भाव जागृत करना है और बुराई की वजह से किसी व्यक्ति से नफरत नहीं करनी है।

आईटीएम यूनिवर्सिटी ग्वालियर के संस्थापक चांसलर रमाशंकर सिंह ने कहा कि वर्तमान संघर्ष कोई साम्प्रदायिक नहीं बल्कि यह देश के अस्तित्व की लड़ाई है। हमें ऐसी स्थितियों से मुकाबला करने के लिए सभी वर्गों और संगठनों का महासंघ बनाना चाहिए। इस देश में साधु-संतों और सूफियों के साझा संदेश तैयार कर के नई पीढ़ियों तक पहुंचाएं और आजादी के नायकों और उनके बलिदान को हर वर्ग तक पहुंचाएं। हमारी लड़ाई जिस ताकत से है, वह बहुत संगठित है, उसका तंत्र सुबह की शाखा से शुरू होता है, वह नई पीढ़ियों के बीच पहुंचते हैं, उन्हें मानसिक रूप से प्रशिक्षित करते हैं और हमने जो खाली जगह छोड़ दी है, उसे वह अपने रंग से भरते हैं।

जाने-माने ईसाई नेता जॉन दयाल ने कहा कि आज संप्रदायिकता देश की व्यवस्था का हिस्सा बनती जा रही है, यहां अल्पसंख्यकों पर अत्याचार होता है और फिर सजा भी उन्हें ही दी जाती है। देश के संविधान ने अल्पसंख्यकों के अधिकार तय कर दिए हैं, अगर यह अधिकार छीन लिए गए तो संवाद का क्या फायदा है?

सिख इंटरनेशनल फोरम के सदस्य सरदार दया सिंह ने कहा कि मुसलमान जो आज हालात का सामना कर रहे हैं, हमने पूर्व में भी ऐसे हालात देखे हैं, हम मुसलमानों के साथ खड़े हैं बल्कि हर प्रताड़ित व्यक्ति के साथ खड़े हैं।
अंत में जमीअत उलम-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया। ओवैस सुल्तान और मेहदी हसन ऐनी दवबंद ने मेहमानों का स्वागत किया और उनकी मेहमानदारी की। जमीअत उलमा-ए-हिंद के सचिव मौलाना नियाज़ अहमद फारूकी ने संगोष्ठी का संचालन किया। उन्होंने वर्तमान स्थिति पर बहुत प्रभावी प्रजेंटेशन दिया।
अपने विचार व्यक्त करने वाली अन्य हस्तियों में डॉ. इंदु प्रकाश सिंह, विजय महाजन, विजय महाजन, प्रो. रितु प्रिया जेएनयू, प्रो. एमएमजे वारसी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, डॉ. लेनिन रघुवंशी संस्थापक पीवीसीएचआर, कैलाश मीना आरटीआई कार्यकर्ता, भाई तेज सिंह, तबस्सुम फातिमा, मरीतोन जयसिंह शोधकर्ता, पुष्प राज देशपांडे, फादर निकोलस, जयंत जगियासोजी, अनुपम जी, अवी कठपालिया, हरीश मिश्रा बनारसवाले, डॉ. हीरालाल एमएलए, फादर निकोलस बराला, मोहनलाल पांडा, एडवोकेट सतीश टम्टा, फादर विजय कुमार नाइक, अभिषेक श्रीवास्तव विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।


فرقہ پرستی کے خلاف ملک کے اکثریتی طبقہ کو کھڑا ہوناہوگا

مولانا محمود اسعد مدنی صدر جمعیۃعلماء ہند کی دعوت پر

ملک کے دانشوروں ، سیاسی اور سماجی رہ نماؤں کا اہم اجتماع منعقد

نئی دہلی ۱۹؍اگست ۲۳ :آج ’’ موجودہ صور ت حال پر باہمی مذاکرہ‘‘ کے عنوان سے ایک اہم اجتماع جمعیۃ علماء ہند کے صدر دفتر نئی دہلی کے مدنی ہال میںمنعقد ہوا، جس میں مختلف شعبۂ حیات سے وابستہ شخصیات ، ماہر ین معیشت ، سماجی کارکنان، مفکراور پروفیسر حضرات شریک ہوئے ۔ اجتماع میں ملک کو درپیش فرقہ پرستی سے چیلنج، سماجی تانے بانے کے بکھرائو اوراس کی روک تھام کے مختلف پہلوؤوںکا جائزہ لیا گیا اور زمینی سطح پر کام کرنے اور سمواد کی ضرورت پر اتفاق کیاگیا ۔سبھی دانشوروں نے یہ محسوس کیا کہ فرقہ پرستی اس ملک کی فطرت سے میل نہیں کھاتی او رنہ وطن عزیز کی اکثریت ایسی سوچ کی طرف دار ہے ، لیکن اس بات کی شدت سے ضرورت محسوس کی جارہی ہے کہ جو لوگ مثبت سوچ کے حامل ہیں ، انھوں نے یا تو خاموشی کی چادر اوڑھ لی ہے یا ان کی بات سماج کے آخری حصے تک نہیں پہنچ رہی ہے،جس کی وجہ سے جو لوگ ملک کی سماجی ڈھانچہ کو بدل دینا چاہتے ہیں یا نفرت کی دیوار کھڑی کرکے اپنی ملک دشمن آئیڈیالوجی کو کامیاب کرنا چاہتے ہیں ، وہ بظاہر حاوی ہوتے نظر آرہے ہیں، حالاں کہ یہ حقیقت نہیں ہے۔اس لیے سماج کی اکثریت کو خاموشی کے بجائے میدان عمل میں آنا ہوگا اور بھارت کی عظمت اوراس کے فطری وجود کو بچانے کی متحدہ و متفقہ لڑائی لڑنی پڑے گی ۔

اپنے افتتاحی کلمات میں جمعیۃ علماء ہند کے صدر اور پروگرام کے داعی مولانا محمود اسعد مدنی نے دانشوروں و سماجی رہ نمائوں کا استقبال کرتے ہوئے سوال کیا کہ ایسے حالات میں جب کہ ملک کی ایک بڑی اقلیت کو ان کے مذہب وعقیدے کی وجہ سے مایوس کرنے یا دیوار سے لگانے کی کوشش کی جارہی ہے ، ہمیں اس کے سدباب کے لیے کیاضروری اقدامات کرنے چاہییں؟ مولانا مدنی نے کہا کہ جمعیۃعلماء ہند کے بزرگوں نے گزشتہ سوسال سے باضابطہ اور دوسو سال سے نا ن آفیشل طور پرملک کو جوڑنے کی کوشش کی اور وطن کی عظمت کو حرز جاں بنایا، جب ملک کی تقسیم کی بنیاد رکھی گئی تو ہمارے اکابر نے اپنوں سے مقابلہ کیا ، ملک کے لیے بے عزتی برداشت کی اور آزادی کے بعد قومی یک جہتی کے لیے اپنی قربانیوں کے انمٹ نقوش چھوڑے اور تمام مشقتوں کے باوجود ہم آج تک اپنی ڈگر سے نہیں ہٹے ہیں ۔ آج کے حالات میں بھی ہم ڈائیلاگ کے حق میں ہیں ، ہمارا موقف ہے کہ سب کے ساتھ ڈایئلاگ ہونا چاہیے اور ایک ایسی مشترکہ مہم چلنی چاہیے کہ وطن کا ہر دھاگہ ایک دوسرے سے جڑ جائے ۔

معروف سماجی مفکر جناب وجے پرتاپ نے اپنے خیالات کا اظہار کرتے ہوئے باہمی مذاکرہ ( سنواد) پر زوردیا اور کہا کہ جمعیۃ علماء ہندنے جو قربانیاں دی ہیں ،وہ بے کار نہیں گئی ، اس کی سب سے بڑی مثال یہ ہے کہ تقسیم ہند کے انتہائی فرقہ وارانہ ماحول کے باوجود ملک کا آئین سیکولر بنیاد پر بنا۔اسلام کے نظریات و افکارکی جو ترقی ہندستان میں ہوئی ، بڑے بڑے اسلامی مفکر یہاں پیدا ہوئے ، جن کے تذکرے کے بغیر عالمی سطح پر اسلام کا تذکرہ ادھورا اور نامکمل ہے ، اس کے علاوہ ملک کی ترقی کے جتنے عناوین ہیں ،ان میں مسلمانوں کا دیگر اہل وطن کی طرح بڑا کردار ہے، اس لئے ہمیں موجودہ حالات میں مایوس ہونے کی ضرورت نہیں ہے ، ہر قوم کے ساتھ ایسے حالات ہو تے ہیں اورجو قوم ہوش مندی کا ثبوت دیتی ہے وہ حالات سے نبرد آزما ہونے میں کامیاب ہو تی ہے۔

ماہر معاشیات پروفیسر ارو ن کمار نے کہا کہ ملک میں معاشی نابرابری کی وجہ سے دائیں بازو کے عناصر کو اپنے خیالات کے فروغ کا موقع مل جاتا ہے، انھوں نے کہا کہ سرکار نے جو دعوی کیا کہ تیرہ کروڑ سے زائد افراد غریبی کی لکیر سے اوپر اٹھ گئے ہیں ،یہ بالکل بے بنیاد بات ہے۔

غیر منظم سیکٹر میں94 فی صد سے زائد لوگ دس ہزار سے کم ماہانہ تنخواہ پاتے ہیں ، جو غربت سے کبھی نہیں ابھر سکتے ۔

سپریم کورٹ کے معروف وکیل سنجے ہیگڑے نے کہا کہ ہم ایک عجیب دور میں رہے ہیں ۔ آج لوگ آئین کو بدلنے کی بات کررہے ہیں ، اس لیے ضروری ہے کہ آئین کی حفاظت کی جائے اور یہ تب ہی ممکن ہے کہ جب ہم آئین کو اس کے حقیقی معنوں میں نافذ کریں اور آئین کو ختم کرنے والوں کو یہ پیغام پہنچائیں ۔

دوسری نشست میں موجودہ حالات کے تدارک پراپنے خیالات پیش کرتے ہوئے جناب ڈاکٹر سوربھ باجپائی مورخ دہلی یونیورسٹی نے کہا کہ مجھے تاریخ کے مطالعہ کے دوران جن اداروں پر فخر کا احساس ہوا ، ان میں ایک جمعیۃ علما ء ہند بھی ہے ۔ اس جماعت کے سرخیل رہ نما حضرت مولانا حسین احمد مدنی ؒ نے پاکستان بننے کی مخالفت کی ، ان کے ساتھ اس ملک کے اکثر مسلمان تھے ، یہ بات سراسرخلاف واقعہ ہے کہ ۹۰ فی صد مسلمانوں نے مسلم لیگ کو ووٹ دیا ،وہ عام مسلمان نہیں تھے بلکہ جاگیردار مسلمان تھے ،جن کو ہی ووٹ کاحق تھا ۔ دہلی کی جامع مسجد کے پاس پاکستان کے حامیوں اور مخالفوں کا اجلاس ہوا۔ حمایت کرنے والوں کے جلسہ میں صرف پانچ سو لوگ تھے اور جو حامی تھے جن کی قیادت جمعیۃ علماء کررہی تھی، ان کے جلسہ میں دس ہزار کا مجمع تھا۔انھوں نے کہا کہ جو قوم اپنی تاریخ بھلا دیتی ہے ، وہ خود کو مٹا دیتی ہے ۔ ہندستان کے مسلمانوں کی اکثریت نے تقسیم کی مخالفت کی تھی ، یہ ایک تاریخ ہے ، ایک طرف صرف مسلم لیگ تھی تو دوسری طرف جمعیۃ علماء کے ساتھ ۱۹ ؍ مسلم جماعتیں تھیں ، اس لیے ملک پر مسلمانوں کا حق اتنا ہی ہے جتنا کسی اور کا ہے۔انھوں نے کہا کہ باہمی مکالمہ تب ہی کامیاب ہو گا جب کہ دونوں فریقین اپنی آئیڈیالوجی اور سوچنے کا طریقہ درست کرلیں ۔

معروف مصنفہ محترمہ رجنی بخشی نے موجود ہ حالات میں گاندھیائی تحریک اہنسا کی وکالت کی او رکہا کہ اہنسا کا مطلب ظلم کے خلاف خاموش رہنا نہیں ہے اور نہ اس کے لیے کسی کو مہاتما بننے کی ضرورت ہے بلکہ ہمیں برے سے برے لوگوں میں اچھا ئی کا احساس پیدا کرنا ہے اور برائی کی وجہ سے کسی کی ذات سے نفرت نہیں کرنی ہے ۔

مسٹر رماشنکر سنگھ بانی چانسلر آئی ٹی ایم یونیورسٹی گوالیر نے کہا کہ موجود ہ لڑائی کوئی فرقہ وارانہ نہیں ہے بلکہ یہ ملک کے وجود کی لڑائی ہے، ہمیں ایسے حالات کا مقابلہ کرنے کے لیے سبھی طبقوں اور تنظیموں کا فیڈریشن بنانا چاہیے ، اس ملک میں سادھوسنتوں اور صوفیوں کے مشترکہ پیغامات تیار کرکے نئی نسلوں کو پہنچائیں اور آزادی کے نائیکوں اور ان کی قربانیوں کو ہر طبقے تک پہنچائیں ۔ ہماری لڑائی جس طاقت سے ہے وہ بہت منظم ہے ، اس کا نظام صبح کی شاکھا سے شروع ہوتا ہے ، وہ نئی نسلوں کے درمیا ن پہنچتے ہیں ، ان کی ذہنی تربیت کرتے ہیں اور ہم نے جو خلا چھوڑدیا ہے اسے وہ اپنی رنگ سے بھرتے ہیں۔

معروف عیسائی رہ نما جان دیال نے کہا کہ آج فرقہ پرستی ملک کے نظام کا حصہ بنتی جارہی ہے ، یہاں اقلیتوں پر ظلم ہو تاہے اور پھر سزا بھی اسے ہی دی جاتی ہے ، ملک کے آئین نے اقلیتوں کے حقوق طے کردیے ہیں ، اگریہ حقوق سلب کرلیے گئے تو ڈائیلاگ کا کیا فائد ہ ہے ۔

سکھ انٹرنیشنل فارم کے رکن سردار دیا سنگھ نے کہا کہ مسلمان جو آج حالات کا سامنا کررہا ہے ، ہم نے ماضی میں ایسے حالات دیکھے ہیں ، ہم مسلمانوں کے ساتھ کھڑے ہیں بلکہ ہر مظلوم کے ساتھ کھڑے ہیں ۔اخیر میں جمعیۃ علماء ہند کے جنرل سکریٹری مولانا حکیم الدین قاسمی نے سبھی مہمانوں کا شکریہ ادا کیا ۔اویس سلطان خاں اور مولانا مہدی حسن عینی دیوبند نے مہمانوں کا استقبال کیا اور ان کی ضیافت کی ۔ مولانا نیاز احمد فاروقی سکریٹری جمعیۃ علماء ہند نے نظامت کے فرائض انجام دیے ، انھوں نے موجودہ حالات پر بہت ہی موثر پرزینٹیشن پیش کیا ۔

دیگر جن شخصیات نے اپنے خیالات کا اظہار کیا ان میں ڈاکٹر اندو پرکاش سنگھ، وجے مہاجن ،پروفیسر ریتو پریا جے این یو ،پروفیسر ایم ایم جے وارثی علی گڑھ مسلم یونیورسٹی ،ڈاکٹر لینن رگھونشی فائونڈر پی وی سی ایچ آر،کیلاش مینا آرٹی آئی ایکٹویسٹ،بھائی تیج سنگھ،تبسم فاطمہ،مریتون جے سنگھ ریسرچر،پشپا راج دیش پانڈے، فادر نکولس، جینت جگیاسوجی ، انوپم جی ، اوی کٹھپالیا، ہریش مشرا بنارس والے ،ڈاکٹر ہیرا لال ایم ایل اے، فادر نکولس برالا،موہن لال پانڈا،ایڈوکیٹ ستیش ٹمٹا، فادر وجے کمار نائک،ابھیشیک شری واستوکے نام خاص طور قابل ذکر ہیں