Press Release

Maulana Hifzur Rahman Seoharvi was an exponent of composite nationalism

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Maulana Hifzur Rahman Seoharvi was an exponent of composite nationalism

Two-day long seminar on lives and contribution of Jamiat leaders held in New Delhi

The situation of the country is worrisome but we will tackle it with wisdom as our elders did: Maulana Mahmood Madani

New Delhi 23 December 2022:- While celebrating the centenary celebrations of Jamiat Ulama-i-Hind, a two-day long seminar on the life and services of Maulana Fakhruddin Ahmed Muradabadi and former Member of Parliament and freedom fighter Maulana Hifzur Rahman Seoharvi was organized here at NDMC Convention Centre in New Delhi.

In Keynote speech Maulana Mahmood Madani, the president Jamiat Ulama-i-Hind said that Maulana Hifzur Rahman Seoharvi was an exponent of composite nationalism and a comprehensive critique of the birth of Pakistan. He joined Mahatma Gandhi and his civil disobedience movement in 1929 was a nationalist and visionary Muslim. He advocated the ideology of Jamiat which opposed the Two Nation Theory, arguing that all Indians, Muslims and Hindus were one nation. Jamiat President Maulana Husain Ahmad Madani argued that the faith was universal and could not be contained within national boundaries but that nationality was a matter of geography, and Muslims were obliged to be loyal to the nation of their birth.

“ Maulana Seoharvi, in various essays, evaluated the implications of partition for the entire Indian Muslim community. He furnished pragmatic arguments to detail Pakistan’s disastrous practical implications for the Indian Muslims. When on 14 June 1947, the Congress Working meeting was held in the Constitution House, Delhi, in which the proposal for the partition of India was moved, Maulana Sehoarvi considering the partition of India as a great crime for the nation did not vote in the favour. Among the prominent members of Indian National Congress, only he was among the two members who differed in many respects and were able to oppose this proposal. Apart from Maulana Sehoarvi, the other member who opposed the proposal of partition was Purushottam Das Tandon.”

“In this critical hour of partition, Maulana Hifzurrahman stood as a rock for the protection of Muslims. On one hand, he made all-out efforts to end carnage with the help of the government and Mahatma Gandhi, and on the other hand, he encouraged Muslims to face the ordeal with the spirit of Islam. He also thrice won from Amroha lok Sabha seat in 1952, 1957, 1962.” Maulana Madani also discussed the life and scholarly wisdom of the Maulana Fakhruddin Ahmad, the ex- president of Jamiat Ulama-i-Hind and ex-principal of Darul Uloom at Deoband.

Maulana further said that that the country is passing through a critical period. Many intellectuals and thinkers are constantly expressing concern over these conditions, but unfortunately the government is failing to resolve it. He said that the conditions were very bad even during the partition of the country, but the leaders of that period especially Maulana Seoharwi faced these conditions with great courage and tenacity. So we need to get guidance from them in present time.

 

In his speech Ameerul Hind Maulana Arshad Madani president JUH said that after the partition of the country, Maulana Hifzurrahaman was at forefront to protect lives of Indian Muslims in Delhi.

Amir of Jamiat Ahle Hadith Hind Maulana Asghar Ali Imam Mehdi Salafi said that Jamiat Ulama-i-Hind has a bright history, the leaders of this JUH were the beacon light for the community. The national unity that is being tried to be torn apart today is highly saddening. Such powers were not less in the past, at that time Maulana Azad and Maulana Hufzur Rahman fought against them head on. Even today the same courage and leadership is needed.

Naib Amirul Hind Mufti Muhammad Salman Mansoorpuri said that after independence, Maulana Seoharvi had a lot of emphasis on religious education. He was one of the founders of the Religious Education Board under whose influence maktabs are being established in every corner of the country today.

The famous historian Maulana Noorul Hasan Rashid Kandhalvi said that Maulana Hifzur Rahman was very courageous man from the beginning. He was truly entitled to the title of Mujahide Millat. He noted that former Prime Minister Lal Bahadur Shastri had also lavishly praised on him.

Maulana Badruddin Ajmal, Member of Parliament praised the papers which were presented in the seminar and said that it should be published in different languages for wider readership. The names of Akhtar Imam Adil Qasmi, Maulana Zia-ul-Haq Khairabadi, Mufti Muhammad Khalid Nimvi, Maulana Abdul Rab Azmi, Ibrahim Abdul Samad, grandson of Hazrat Mujahide Millat, Dr. Abu Bakr Ibad, Farooq Argali, Mufti Sanaul Huda Qasmi Patna, Prof Akhtarul Wasey, Mufti Affan Mansoorpuri etc. are particularly noteworthy who presented papers on this occasion.

On this occasion, JUH General Secretary Maulana Hakeemuddin Qasmi thanked all the paper writers and conveners.

 

जमीयत के शताब्दी समारोह के अंतर्गत मौलाना फखरुद्दीन अहमद और मौलाना हिफ्जुर्रहमान पर नई दिल्ली में सेमिनार संपन्न

देश विभाजन के दौरान भारतीय मुसलमानों की रक्षा करने में मुजाहिद मिल्लत ने उत्कृष्ट भूमिका निभाईः मौलाना अरशद मदनी
- हमारे पूर्वजों ने बुरे से बुरे हालात का सामना समझदारी और सूझबूझ के साथ कियाः मौलाना महमूद मदनी
- जमीयत उलेमा-ए-हिंद के बुजुर्ग उम्मत के लिए आदर्श और अनुकरणीय थेः मौलाना असगर अली इमाम महदी सलफी

नई दिल्ली, 23 दिसंबर, 2022। शताब्दी समारोह के अंतर्गत जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी की देखरेख में हजरत मौलाना फखरुद्दीन अहमद मुरादाबादी और हजरत मौलाना हिफ्जुर्रहमान सिवहारवी के जीवन और योगदान पर दो दिवसीय सेमिनार आज एनडीएमसी कन्वेंशन सेंटर में संपन्न हुआ। अंतिम सत्र की अध्यक्षता अमीरुल हिंद जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने की जबकि संचालन की भूमिका मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी ने निभाई। इस सेमिनार के संध्याकालीन सत्र की अध्यक्षता दारुल उलूम देवबंद के कुलपति और शेख-उल-हदीस मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने की।
अपने मुख्य संबोधन में अमीरुल हिन्द मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा कि देश के बंटवारे के बाद पूरी जमीयत एक परीक्षा की घड़ी से गुजर रही थी। एक तरफ जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अपने लोगों के विरोध के बावजूद देश का बंटवारा स्वीकार नहीं किया, दूसरी तरफ भारत में रहने वाले मुसलमानों के सामने भविष्य की चिंता थी। हरियाणा और पंजाब में मुसलमानों को निकाला जा रहा था, दिल्ली में भी ऐसी ही परिस्थितियों का सामना था। उस समय मौलाना हिफ्जुर्रहमान से यह भी कहा गया कि आप जिन-जिन परिवारों के बारे में चाहते हैं, उनकी सूची दे दें, हम उनकी रक्षा करेंगे। बाकी सभी मुसलमानों की चिंता छोड़ दें। तब मौलाना ने दो-टूक जवाब दिया कि यह कतई स्वीकार्य नहीं है कि केवल हिफ्जुर्रहमान की जान बच जाए और बाकी सभी खतरे में रहें। इसलिए मौलाना हिफ्जुर्रहमान सिवहारवी ने मौलाना अबुल कलाम आजाद के साथ गांधीजी और पंडित नेहरू से मुलाकात की और उन्हें मनाया कि दिल्ली को दक्षिण भारत की सेना के हवाले किया जाए। इसके बाद शांति स्थापित हुई वरना षडयंत्र रचा जा रहा था कि दिल्ली को मुसलमानों से खाली करा लिया जाए।
मौलाना अरशद मदनी ने हजरत मौलाना फखरुद्दीन अहमद की याददाश्त की ताकत को अद्वितीय बताया और कहा कि जयपुर में उन्हें रमजान बिताना था, तो वहां के लोगों ने मौलाना से इच्छा जताई की कि वह तरावीह में पूरा कुरान सुनाएंगे। हालांकि मौलाना हाफ़िज़ (पूरे कुरान को कंठस्थ करने वाले) नहीं थे लेकिन लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए वह हर दिन एक पारा याद करते और रात को तरावीह में सुना देते। इस तरह केवल एक महीने में उन्होंने पूरे कुरान को याद कर लिया और सुना भी दिया।
इससे पूर्व जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने नौजवान उलेमा द्वारा सेमिनार में उत्कृष्ट शोधपत्र प्रस्तुत किए जाने के लिए सराहना की। साथ ही सेमिनार के संयोजकों मौलाना मुफ्ती मोहम्मद अफ्फान मंसूरपुरी, मौलाना जियाउल हक खैराबादी और सहायक मौलाना अब्दुल मालिक रसूलपुरी का धन्यवाद किया। उन्होंने कहा कि देश एक संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। बहुत से विद्वान और चिंतक इन परिस्थितियों पर लगातार चिंता व्यक्त कर रहे हैं। हर वर्ग, चाहे वह प्रभावित हो या न हो, वर्तमान हालात पर चिंता व्यक्त कर रहा है।
उन्होंने कहा कि देश के विभाजन के समय भी हालात बहुत खराब थे। उस दौर के नेताओं विशेषकर मुजाहिद-ए-मिल्लत ने बड़ी हिम्मत से इन परिस्थितियों का मुकाबला किया। इसलिए हमें उनसे मार्गदर्शन लेने की जरूरत है। मौलाना मदनी ने देश के विभाजन और अखंड राष्ट्रवाद के संबंध में जमीयत उलेमा की बुद्धिमान सोच और अडिग विचारधारा के बारे में बात करते हुए कहा कि इन पूर्वजों ने जो कुछ कहा था, वह धर्म और शरीयत के नियमों के अनुसार था, महज आवश्यकता या समय के अनुसार कोई दृष्टिकोण या राजनीतिक समझौता नहीं था। शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों में से मौलाना अब्दुल हमीद नोमानी और प्रो. अख्तरुल वासे ने जमीयत के अखंड राष्ट्रवाद के विचार को क्रमशः धार्मिक और अनुभव के आधार पर बिलकुल सही ठहराया।
मरकजी जमीयत अहले हदीस हिंद के अमीर मौलाना असगर अली इमाम मेहदी सलफी ने कहा कि जमीयत उलेमा हिंद का एक शानदार इतिहास है। इस संगठन के पूर्वज उम्मत के आदर्श और रोल मॉडल थे। आज जिस राष्ट्रीय एकता को खंडित करने का प्रयास किया जा रहा है, ऐसी शक्तियां पहले भी कम नहीं थीं। उस वक्त मौलाना आजाद और मौलाना हिफ्जुर्रहमान ने उनसे डटकर मुकाबला किया। आज भी उसी ही हिम्मत और नेतृत्व की जरूरत है।
नायब अमीरुल हिंद मुफ्ती मोहम्मद सलमान मंसूरपुरी ने कहा कि आजादी के बाद हजरत मुजाहिद मिल्लत का धार्मिक शिक्षा पर बहुत जोर था। वह फरमाते थे कि आने वाली पीढ़ियों को ईमान पर जमाए रखने की बड़ी आवश्यकता है और मुसलमानों का आधार धार्मिक शिक्षा है। वह जमीयत की देखरेख में बने दीनी तालीमी बोर्ड के संस्थापकों में से थे जिनके प्रभाव से आज देश के कोने-कोने में मकातिब (धार्मिक और आधुनिक शिक्षा वाले स्कूल) स्थापित हैं।
प्रसिद्ध इतिहासकार मौलाना नूरुल हसन राशिद ने कहा कि मौलाना हिफ्जुर्रहमान शुरू से ही बहुत हिम्मती और साहसी थे और मौलाना अबुल हसन अली नदवी के कथन के अनुसार मुजाहिद-ए-मिल्लत की उपाधि के वास्तव में हकदार थे। पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मौलाना के बारे में कहा था कि नेता दौलत और सरकार से नहीं बनता बल्कि नेता पैदा होता है। यह बात मौलाना पर चरित्रार्थ होती है।
संसद सदस्य और असम जमीयत उलेमा के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने शोधपत्रों की प्रशंसा की और कहा कि इसे अलग-अलग तरीकों से प्रकाशित किया जाना चाहिए ताकि इसका व्यापक रूप से प्रयोग और उपयोग किया जा सके। आज शोधपत्र प्रस्तुत करने वाले अन्य लोगों में प्रो. अख्तरुल वासे, मौलाना नदीमुल वाजिदी देवबंद, मुफ्ती अख्तर इमाम आदिल कासमी, मौलाना ज़ियाउल हक खैराबादी, मुफ्ती मोहम्मद खालिद नीमवी, मौलाना अब्दुर्रब आजमी, हजरत मुजाहिद-ए-मिल्लत के पोते इब्राहीम अब्दुस्समद, डॉ. अबूबक्र इबाद, फारूक अरगली, मुफ्ती सनाउल हुदा कासमी पटना आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय रहे।
इसके अलावा मौलाना कारी शौकत अली खजिन जमीअत उलमा-ए-हिन्द , मौलाना नियाज अहमद फारूकी सचिव जमीयत उलेमा हिंद, मौलाना अब्दुल रब आजमी, मौलाना मुहम्मद मदनी, मौलाना अब्दुल हे खैराबादी, मौलाना अकील गढ़ी दौलत, मौलाना मुफ्ती जावेद इकबाल किशनगंजी, मौलाना मुहम्मद नाजिम पटना, हाजी मुहम्मद हारून, मौलाना याहया करीमी, मुफ्ती हबीबुर रहमान इलाहाबाद, मौलाना आबिद कासमी दिल्ली, मौलाना इस्लामुद्दीन कासमी दिल्ली और जमीअत के कई राज्य और जिला अधिकारी उपस्थित थे। दारुल उलूम देवबंद और अन्य मदरसों के कई महत्वपूर्ण शिक्षक भी उपस्थित थे।हकीम सैयद बदरे आलम हापुड़ और सैयद रिजवान मोइन मुरादाबाद ( हजरत मौलाना फखरुद्दीन अहमद) के पोते भी मौजूद थे।
इस अवसर पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के महासचिव मौलाना हकीमुद्दीन कासमी ने सभी शोधपत्र प्रस्तुत करने वालों और संयोजकों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपील की कि जुमा के खुत्बों में अपने पूर्वजों की कुर्बानियों का वर्णन किया जाए ताकि नई पीढ़ी को उनके बारे में पता चल सके।

 

جمعیۃ کی صدسالہ تقریبات کے تحت
 مولانا فخرالدینؒ احمد اور مولانا حفظ الرحمنؒ  پر دو روزہ سیمینار اختتام پذیر
تقسیم وطن کے وقت مسلمانان ہندکے تحفظ میں مجاہد ملت ؒنے بے مثال کارنامہ انجام دیا: مولانا ارشد مدنی
 ہمارے اکابر نے بدسے بدتر حالات کامقابلہ دانشمندی وہوش مندی سے کیا : مولانا محمود مدنی
 جمعیۃ علماء ہند کے اکابر امت کے اساطین اور نمونہ تھے : مولانا اصغر علی امام مہدی سلفی



نئی دہلی ۲۳؍دسمبر۲۰۲۲ء
 صدسالہ تقریبا ت کے تحت جمعیۃ علماء ہند کے صدر مولانا محموداسعد مدنی کے زیر نگرانی حضرت مولانا فخرالدین احمد مرادآبادیؒ اور حضرت مولانا حفظ الرحمن سیوہاروی ؒ کی حیات و خدمات پر دوروزہ سیمینار آج این ڈی ایم سی کنوینشن سینٹر میںمکمل ہوگیا ۔آخری نشست کی صدارت امیر الہند مولانا ارشد مدنی صدر جمعیۃ علماء ہند نے کی جب کہ نظامت کے فرائض مولانا مفتی محمد عفان منصورپوری نے انجام دیے ۔اس سیمینار کی گزشتہ شام کی نشست کی صدارت دارالعلوم دیوبند کے مہتمم و شیخ الحدیث مفتی ابوالقاسم نعمانی نے کی ۔
اپنے کلیدی خطاب میں امیر الہند مولانا سید ارشد مدنی نے کہا کہ ملک کی تقسیم کے بعد پوری جمعیۃ ایک امتحان میں مبتلا تھی ، ایک طرف جمعیۃ علماء ہند نے اپنوں کی شدید مخالفت کے باوجود تقسیم وطن کو قبول نہیں کیا ، دوسری طرف ہندستان میں رہنے والے مسلمانوں کے مستقبل کا مسئلہ درپیش تھا ۔ہریانہ و پنجاب میں مسلمانوں کا انخلا ہو رہا تھا ،دہلی سے بھی مسلمانوں کو نکالنے کی سازش ہورہی تھی۔ اس وقت مولانا حفظ الرحمن ؒ سے یہ بھی کہا گیا کہ آپ جن جن خاندانوں کے بارے میں چاہتے ہیں، ان کی فہرست دیدیں ، ہم ان کی حفاظت کریں گے ، باقی سارے مسلمانوں کی فکر چھوڑ دیں ، تو مولانا نے برجستہ جواب دیا کہ یہ ہرگز منظور نہیں کہ صرف حفظ الرحمن کی جان بچ جائے اور باقی سب خطرے میںرہیں، چنانچہ مولانا حفظ الرحمن سیوہاروی ؒ نے مولانا ابوالکلام آزاد ؒکے ساتھ گاندھی جی اور پنڈت نہرو سے ملاقات کی اور ا ن کو قائل کیا کہ دہلی کو جنوبی ہند کی فوج کے حوالے کیا جائے ،چنانچہ اس کے بعد امن قائم ہوا اور مسلمانوں کی زندگی بچ پائی ۔مولانا ارشد مدنی نے حضرت مولانا فخرالدین احمد ؒ کی قوت حافظہ کو فقید المثال بتاتے ہوئے کہا کہ انھوں نے محض ایک ماہ میں مکمل قرآن حفظ بھی کیا اور تراویح میں سنابھی دیا ۔
اس سے قبل مولانا محمود اسعد مدنی صدر جمعیۃ علماء ہند نے نوجوان علماء کی طرف سے سیمینار میں وقیع مقالہ پیش کیے جانے کی ستائش کی، ساتھ ہی کنوینرس مولانا مفتی محمد عفان منصورپوری، مولانا ضیاء الحق خیرآبادی اور معاون مولانا عبدالمالک رسول پوری کا شکریہ ادا کیا ۔ انھوں نے کہا کہ ملک نازک دور سے گزررہا ہے ،بہت سے دانشور اور مفکرین ان حالات پر لگاتار فکرمندی کا اظہار کررہے ہیں،مگر افسوس سرکار اس کے ازالے میں ناکام ہے ۔ انھوں نے کہا کہ تقسیم وطن کے وقت بھی حالات بہت خراب تھے ، اس دور کے قائدین بالخصوص مجاہد ملتؒ نے بڑی پامردی سے ان حالات کا مقابلہ کیا۔ اس لیے ہمیں ان سے رہ نمائی حاصل کرنے کی ضرورت ہے ۔ مولانا مدنی نے تقسیم وطن اور متحدہ قومیت کے سلسلے میں جمعیۃ علماء کے مستحکم نظریے پر بات کرتے ہوئے کہا کہ ان اکابر نے جو کچھ کہا تھا وہ دین واحکام شریعت کے مطابق تھا ، محض وقتی نظریہ یا سیاسی مصلحت پسندی نہ تھی ۔مقالہ نگاروں میں سے مولانا عبدالحمید نعمانی اور پروفیسر اخترالواسع نے جمعیۃ کے نظریہ متحدہ قومیت کو بالترتیب دینی و تجرباتی بنیاد پر برحق بتایا ۔
 مرکزی جمعیت اہل حدیث ہند کے امیر مولانا اصغر علی امام مہدی سلفی نے کہا کہ جمعیۃ علماء ہند کی ایک روشن تاریخ ہے ، اس جماعت کے اکابر، امت کے اساطین اور نمونہ تھے ، آج جس قومی اتحاد کو پارہ پارہ کرنے کی کوشش کی جارہی ہے ، اس طرح کی طاقتیں ماضی میں کم نہ تھیں، اس وقت مولانا آزاد ؒ اور مولانا حفظ الرحمن ؒ نے ان سے سینہ سپر ہو کر مقابلہ کیا ، آج بھی اسی حوصلہ اور قیادت کی ضرورت ہے ۔
 نائب امیر الہند مفتی محمد سلمان منصورپوری نے کہا آزادی کے بعد حضرت مجاہد ملتؒ کا دینی تعلیم پر کافی زور تھا ، وہ فرماتے تھے کہ آنے والی نسلوں کو ایمان پر قائم رکھنے کی بڑی ضرورت ہے اور  دینی تعلیم مسلمانوں کی بنیاد ہے ۔وہ جمعیۃ کے زیر نگرانی دینی تعلیمی بورڈ کے بانیوں میں سے تھے جس کے زیر اثر آج ملک کے گوشے گوشے میں مکاتب قائم ہیں ۔
مشہور مورخ مولانا نورالحسن راشد کاندھلوی نے کہا مولانا حفظ الرحمن ؒ شروع سے ہی بہت جرات مند او رباحوصلہ تھے اور بقول مولانا ابوالحسن علی ندوی ؒ مجاہد ملت کے خطاب کے سچے حق دار تھے ، سابق وزیر اعظم لال بہادر شاستری نے مولانا کے بارے میں فرمایا تھا کہ لیڈر دولت اور حکومت سے نہیں بنتا بلکہ لیڈر پیدا ہوتا ہے ،یہ خصوصیت مولانا پر منطبق ہوتی ہے ۔
مولانا بدرالدین اجمل ممبر پارلیامنٹ و صد رجمعیۃ علماء آسام نے مقالہ جات کی تعریف کی اور کہا کہ مختلف طریقوں سے اس کی اشاعت کی جائے تاکہ افادہ اور استفادہ عام ہو ، آج کے دیگر اہم مقالہ نگاروں میں پروفیسر اخترالواسع، مولانا ندیم الواجدی دیوبند، مفتی اختر امام عادل قاسمی ،مولاناضیاء الحق خیر آبادی،مفتی محمد خالد نیموی ،مولانا عبدالرب اعظمی ، ابراہیم عبدالصمد نواسہ حضرت مجاہد ملت ، ڈاکٹر ابوبکر عباد،فاروق ارگلی،مفتی ثناء الہدی قاسمی پٹنہ وغیرہ کے نام خاص طور سے قابل ذکر ہیں ۔ اس کے علاوہ مولانا قاری شوکت علی خازن جمعیۃ علماء ہند،مولانا نیاز احمد فاروقی سکریٹری جمعیۃعلماء ہند، مولانا عبدالرب اعظمی ، مولانا محمد مدنی ، مولانا عبدالحی خیرآبادی، مولانا عاقل گڑھی دولت، مولانا مفتی جاوید اقبال کشن گنجی ، مولانا محمد ناظم پٹنہ ، حاجی محمد ہارون، مولانا یحیی کریمی،مفتی حبیب الرحمن الہ آباد ، مولانا عابد قاسمی دہلی ، مولانا اسلام الدین قاسمی دہلی سمیت جمعیۃ کے کئی ریاستی و ضلعی ذمہ داران موجود تھے۔ دارالعلوم دیوبند اور دیگر مدارس کے بھی کئی اہم اساتذہ موجود تھے ۔حکیم سید بدر عالم ہاپوڑ اور سید رضوان معین مرادآباد پوتے حضرت مولانا فخرالدین احمد ؒ بھی موجود تھے ۔
اس موقع پر جمعیۃ علما ء ہند کے ناظم عمومی مولانا حکیم الدین قاسمی نے سبھی مقالہ نگاروں ، کنوینرس حضرات کا شکریہ ادا کیا ، انھوں نے اپیل کی کہ جمعہ کے خطبوں اور دینی درسگاہوں میں اپنے اکابر کی قربانیوں کا تذکرہ کیا جائے تا کہ جدید نسل کو ان کے بارے میں پتہ چلے ۔

 

 

 

Dec. 23, 2022