Can Omnibus Orders Be Passed Against Demolitions

Can Omnibus Orders Be Passed Against Demolitions? Supreme Court Asks In Jamiat Pleas Challenging "Bulldozer" Actions

Our prime concern is that the Constitution and its sovereignty do not collapse: said the petitioner and JUH president Maualna Mahmood Madani

New Delhi July 13, 2022: While hearing PILs filed by the Jamiat Ulama-i-Hind alleging that authorities in states like UP and MP are resorting to "bulldozer" action to demolish the houses of persons accused in cases like riots, the Supreme Court on Tuesday orally asked if it can pass omnibus orders restraining demolition of unauthorized constructions.
The bench of Justices BR Gavai and PS Narasimha orally observed,
"Rule of law has to be followed, no dispute. But can we pass an omnibus order. If under the Municipal law the construction is unauthorized, can an omnibus order be passed to restrain authorities?" .
Reacting to today’s court hearing, the petitioner and the President of Jamiat Ulama-i-Hind Maulana Mahmood Madani said that the manner in which arbitrary justice is being delivered by the government for an alleged crime that is not proven in the court is against justice itself. He said he has approached the court to uphold the constitution of the country and its rule. He maintained that houses are built or demolished. It is not a big concern; our prime concern is that the Constitution and its sovereignty do not collapse. And our struggle for this has been going on for a long time and will continue (Insha’Allah).
Today, on behalf of Maulana Mahmood Madani, Senior Advocate Dushyant Dave submitted that the government is taking "selective action" against those accused in riots.
"Demolition of houses merely because somebody is accused in a crime is not acceptable in our society. We are governed by rule of law…",. Citing a report of Indian Express, Dave submitted that in Assam, the house of a person was demolished after he was accused in a crime. The senior counsel argued that police authorities are not resorting to demolition as a form of punishment.
Senior Advocate CU Singh, also appearing for Jamiat, alleged that despite the status quo order passed by the Supreme Court in Jahangirpuri, the same modus operandi was followed in many other cities, including UP. "We have given numerous cases, where police officers announcing demolition and demolishing the houses of the accused," he said.
However, Solicitor General Tushar Mehta raised a preliminary objection as to the locus of the Petitioner Jamiat Ulema-i-Hind. He submitted that the individual affected parties have already approached the High Courts. The SG added that the petitioners are creating a "sensationalizing hype unnecessarily".

"Replies have been filed by authorities that procedure was followed and notices were issued. Process started much before riots."
Senior Counsel Harish Salve, also appearing for the State, argued that the Court cannot pass an order that a house should not be demolished merely because the individual involved is an accused in a case. He asked the petitioners to not go by newspaper reports.
Singh contended that there are numerous instances where the Police authorities announced demolition of the houses of the accused.

"The problem is the police authorities are announcing that the houses of accused will be demolished. The SP of Kanpur, the SP of Saharanpur, they are announcing," he argued.
Dave added that there is no material to show that other unauthorized houses were acted against. "There is a pick and choose against other community… The entire Sainik Farm is illegal. Nobody has touched it in 50 years. Look at the illegal farm houses in Delhi. No action taken. Selective action is taken," he said.
"There is no other community. Only Indian community", the SG retorted.
The matter is now listed for hearing on August 10.
Jamiat Ulema-i-Hind has filed two PILs - one seeking a general declaration that demolition actions cannot be taken as a punitive measure against persons accused of committing offences. The second PIL was filed against the demolition actions carried out by North Delhi Municipal Corporation after the riots during Hanuman Jayanti processions.
After demolition actions were taken against some buildings in Kanpur and Prayagraj, Jamiat filed an application in its petition relating to Jahangirpuri, alleging that the UP authorities were targeting those accused of violence during protests against the remarks of Prophet Muhammed.
On June 16, 2022 the vacation bench of Justices AS Bopanna and Vikram Nath had asked the Uttar Pradesh government not to carry out demolition activities except in accordance with the procedure established by law. It has also granted three days' time to the State, to demonstrate how the recent demolitions were in compliance with the procedural and municipal laws. "Action will only be in accordance with law," it said.
In response, the State of Uttar Prades submitted an affidavit that the recent demolitions carried out in Kanpur and Prayagraj were done by Local Development Authorities strictly in accordance with the Uttar Pradesh Urban Planning and Development Act, 1973.
The State categorically denied that the demolitions were linked to riots and maintained that the process for initiated for violation of the building rules.
Dear Editor
Kindly publish it and oblige
Niaz Ahmad Farooqi
Secretary, Jamiat Ulama-i-Hind


बुलडोजर कार्रवाई पर कानूनी लड़ाई का हमारा एकमात्र उद्देश्य देश में कानून का शासन स्थापित करनाः मौलाना महमूद मदनी
- यूपी बुलडोजर कार्रवाई पर अदालत ने पूछा- क्या विध्वंस कार्रवाई के खिलाफ सर्वव्यापी आदेश पारित किया जा सकता है?
नई दिल्ली, 13 जुलाई 2022ः
उत्तर प्रदेश समेत देश के कई राज्यों में जारी बुलडोजर की कार्रवाई के मामले पर आज सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई पर अपनी राय प्रस्तुत करते हुए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी ने कहा कि जिस तरह से इंसाफ करने की कोशिश की जा रही है, वह न केवल न्याय के विरुद्ध है बल्कि इससे कहीं ज्यादा यह एक वर्ग को निशाना बनाने वाली प्रक्रिया है। हम सुप्रीम कोर्ट इसीलिए गए हैं ताकि देश का संविधान और उसका शासन स्थापित रहे। उन्होंने कहा कि घर तो टूटते रहते हैं, लेकिन देश और उसका संविधान न टूटे, यही हमारे संघर्ष का मूल दृष्टिकोण है। और इसके लिए हमारा संघर्ष लंबे समय से चल रहा है और जारी रहेगा (इंशाअल्लाह)।
काबिलेजिक्र है कि विरोध-प्रदर्शनों में भाग लेने या किसी गलत काम के आरोप के बाद एक परंपरा चल पड़ी है कि आरोपी के घर पर बुलडोजर चला दिया जाए, जो अपने आप में एक क्रूर कृत्य है। यह कार्रवाई किसी भी परिवार की सामूहिक सजा देने की सोच पर आधारित है। यह सब मध्य प्रदेश, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, गुजरात और असम में लगातार हो रहा है। इस मामले में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी की याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीआर गवई और पीआर नरसिम्हा की खण्डपीठ में सुनवाई हुई, जहां जमीयत उलेमा-ए-हिंद के वरिष्ठ अधिवक्ता दुष्यंत दवे ने तर्कसंगत बहस करते हुए कहा कि सरकार हंगामे में लिप्त लोगों के विरुद्ध उसकी पहचान और धर्म के आधार पर कार्रवाई कर रही है। उन्होंने कहा, “घरों को केवल इसलिए तोड़ना कि किसी पर किसी अपराध का आरोप लगाया गया हो, हमारे समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता है। हम कानून के शासन वाले देश में रहते हैं, यहां कोई राजशाही या तानाशाही नहीं चलती।’’
उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट का उल्लेख करते कहा कि असम में कल ही एक व्यक्ति के घर को गिरा दिया गया क्योंकि उस पर किसी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप है। वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि पुलिस अधिकारी सजा के तौर पर तोड़फोड़ की कार्रवाई का सहारा ले रहे हैं। यह भी कहा गया कि जहांगीरपुरी में सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद उत्तर प्रदेश समेत कई अन्य राज्यों एवं शहरों में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई और लगातार नोटिस दिया जा रहा है। इस सम्बंध में कई मामलों का उल्लेख भी किया गया।
हालांकि भारत के सॉलिसिटर जनरल और दूसरे सरकारी वकील हरीश साल्वे ने यह आरोप लगाया कि जमीयत जैसा संगठन मामले को अनावश्यक तौर पर तिल का ताड़ बना रहे है। यह कार्रवाई केवल अवैध निर्माण के खिलाफ है और यह प्रक्रिया दंगे होने से पहले शुरू की गई थी। इस पर दुष्यंत दवे ने कहा कि ऐसी कोई सामग्री नहीं है जिससे साबित हो कि अन्य अनधिकृत या अवैध घरों के खिलाफ कार्रवाई की गई है, बल्कि यह एक समुदाय के खिलाफ प्रतिशोध की कार्रवाई है... अन्यथा पूरा सैनिक फॉर्म अवैध है। 50 सालों से इसे किसी ने हाथ तक नहीं लगाया। दिल्ली के अवैध फार्महाउसों को देखिए। कोई कार्रवाई नहीं की गई है।’’ इसलिए जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने जहांगीरपुरी में स्टे ऑर्डर जारी किया है, उसी तरह उत्तर प्रदेश आदि में भी आदेश जारी करे और प्रशासन को तानाशाही फैसले लेने से रोके।
इस पर सुप्रीम कोर्ट की खण्डपीठ ने मौखिक रूप से पूछा, “इस पर कोई सवाल ही नहीं है कि सरकार को कानून के शासन का पालन करना होगा, लेकिन क्या हम एक सर्वव्यापी आदेश पारित कर सकते हैं? अगर नगरीय निकाय कानून के अंतर्गत कोई घर अवैध है तो क्या अधिकारियों को रोकने के लिए एक सर्वव्यापी आदेश पारित किया जा सकता है?“ इस सवाल के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 10 अगस्त की तारीख निर्धारित की है।
ज्ञात हो कि कानपुर और प्रयागराज में कुछ भवनों के खिलाफ विध्वंस की कार्रवाइयों के बाद जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने जहांगीरपुरी से सम्बंधित अपनी याचिका के साथ एक याचिका और जोड़ी है जिसमें कहा गया है कि यूपी के अधिकारी उन लोगों को निशाना बना रहे हैं जिनपर इस्लाम के पैगंबर के खिलाफ टिप्पणियों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों में “दंगे“ का आरोप लगाया गया है।
16 जून, 2022 को जस्टिस एएस बोपन्ना और विक्रम नाथ की अवकाश पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार से कहा था कि वह कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया से बाहर निकल कर विध्वंस की गतिविधियों को अंजाम न दे। उन्होंने राज्य को तीन दिन का समय भी दिया था ताकि वह जवाब दें कि हालिया विध्वंस की कार्रवाई किस नगर निगम या नगरपालिका कानून के तहत अंजाम दी गई है। इसके जवाब में उत्तर प्रदेश राज्य ने एक हलफनामा दायर किया कि कानपुर और प्रयागराज में हाल ही में की गई तोड़फोड़ की कार्रवाई स्थानीय विकास प्राधिकरणों ने उत्तर प्रदेश अर्बन प्लानिंग एण्ड डेवलपमेंट एक्ट-1973 के अनुसार की है। सरकार ने स्पष्ट रूप से इस बात से इनकार किया है कि विध्वंस कार्रवाई का सम्बंध दंगों से था, लेकिन सच्चाई तो यह है कि सरकार केवल इस पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है।
प्रिय संपादकगण
इस प्रेस बयान को प्रकाशित कर धन्यवाद का अवसर दें
नियाज अहमद फारूकी
सचिव, जमीयत उलेमा-ए-हिन्द


یوپی بلڈوزر کارروئی : کیا انہدائی کارروائی کے خلاف علی الاطلاق آرڈر پاس کیا جاسکتا ہے؟
سپریم کورٹ نے عرضی گزار جمعیۃ علماء ہند ودیگر سے پوچھا
ہمارا مقصد صرف یہ ہے کہ ملک میں قانون کا حکمرانی ہو اور انصاف نظر آئے : مولانا محمود مدنی

نئی دہلی ۔۱۳؍جولائی
مظاہرو ں میں شرکت یا کسی غلط کام کے الزام کے بعد ایک روایت چل پڑی ہے کہ ملزم کے گھر پر بلڈوزر چلادیا جائے ،جو اپنے آپ میں ایک ظالمانہ عمل ہے ۔ یہ عمل کسی بھی خاندان کو اجتماعی سزادینے پر منتج ہوتا ہے۔ یہ سب کچھ مدھیہ پردیش ، دہلی ، پوپی ، گجرات اورآسام میں لگاتا ر ہور ہا ہے۔اس معاملے میں جمعیۃ علماء ہند کے صدر مولانا محمود اسعد مدنی کی عرضی پر آج سپریم کورٹ کی جسٹس بی آر گاوائی اور پی ایس نرسمہا کی بنچ کے سامنے سماعت ہوئی، جہاں جمعیۃ علماء ہند کے سینئر وکیل دشینت داو ے نے عالمانہ بحث کرتے ہوئے کہا کہ حکومت ہنگامہ میں ملوث افراد کے خلاف اس کی شناخت اور مذہب کی بنیاد پر کارروائی کررہی ہے۔ انھوں نے کہا کہ"مکانات کو صرف اس لیے مسمار کرنا کہ کسی پر کسی جرم کا الزام لگایا گیا ہو، ہمارے معاشرے میں قابل قبول نہیں ہوسکتا۔ ہم قانون کی حکمرانی والے ملک میں رہتے ہیں، یہاں کوئی شہنشاہیت یا آمریت نہیں چلتی" انھوں نے انڈین ایکسپریس کی ایک رپورٹ کا حوالہ دیتے ہوئے عرض کیا کہ کل ہی آسام میں ایک شخص کے گھر کو گرا دیا گیا کیوں کہ اس پر کسی کو خودکشی پر مجبور کرنے کا الزام ہے۔ سینئر وکیل نے دلیل دی کہ پولیس حکام سزا کے طور پر انہدام کا سہارا لے رہے ہیں،یہ بھی کہا گیا کہ جہانگیرپوری میں سپریم کورٹ کی طرف سے اسٹے کے باوجود ، یوپی سمیت کئی دوسرے شہروں میں بھی اسی طریقہ کار کی پیروی کی گئی اور لگاتا ر نوٹس دیا جارہا ہے۔ اس سلسلے میں کئی معاملات کا حوالہ بھی دیا گیا۔
حالاں کہ سالیسٹر جنرل آف انڈیا اور دوسرے سرکاری وکیل ہریش سالوے نے یہ الزام عائد کیا کہ جمعیۃ جیسی تنظیم معاملے کو بلا ضرورت تل کا تاڑ بنارہی ہے ، یہ کارروائی صرف غیر قانونی تعمیرات کے خلاف ہے اور یہ عمل ہنگامہ سے پہلے ہی شروع کیا گیا تھا ، اس پر دشینت داو ے نے کہا کہ ایسا کوئی مواد نہیں ہے جس سے ظاہر ہو کہ دیگر غیر مجاز مکانات کے خلاف کارروائی کی گئی ہے ،بلکہ یہ ایک کمیونٹی کے خلاف انتقامی کارروائی ہے… ورنہ تو پورا سینک فارم غیر قانونی ہے۔ 50 سالوں سے کسی نے اسے ہاتھ تک نہیں لگایا۔ دہلی کے غیر قانونی فارم ہاؤسز کو دیکھیں۔ کوئی کارروائی نہیں کی گئی۔" اس لیے سپریم کورٹ نے جس طرح جہانگیر پوری میں اسٹے کاحکم جاری کیاہے،اسی طرح یوپی وغیرہ میں حکم جاری کرے اور انتظامیہ کو آمرانہ فیصلے سے روکے ۔
اس پر سپریم کورٹ کی بنچ نے زبانی طور سے پوچھا کہ " اس پر کوئی کلام نہیں کہ سرکار کو قانون کی حکمرانی پر عمل کرنا ہوگا، لیکن کیا ہم ایک علی الاطلاق آرڈر پاس کر سکتے ہیں؟۔ اگر میونسپل قانون کے تحت کوئی مکان غیر قانونی ہے ، تو کیا حکام کو روکنے کے لیے علی الاطلاق آرڈر پاس کیا جا سکتا ہے؟" اس سوال کے ساتھ سپریم کورٹ نے اس معاملے کی اگلی سماعت کے لیے 10 اگست کی تاریخ مقرر کی ہے۔
واضح ہو کہ کانپور اور پریاگ راج میں کچھ عمارتوں کے خلاف انہدامی کارروائیوں کے بعد، جمعیۃ علماء ہند نے جہانگیرپوری سے متعلق اپنی عرضی کے ساتھ ایک عرضی اور ملحق کی جس میں کہا گیا کہ یوپی کے حکام ان لوگوں کو نشانہ بنا رہے ہیں جن پر پیغمبر اسلام صلی اللہ علیہ وسلم کے خلاف تبصروں کو لے کر ہوئے مظاہرے میں’ فساد‘ کا الزام ہے۔
16 جون، 2022 کو جسٹس اے ایس بوپنا اور وکرم ناتھ کی تعطیلاتی بنچ نے اتر پردیش کی حکومت سے کہا تھا کہ وہ قانون کے ذریعہ قائم کردہ طریقہ کار سے باہر نکل کر مسماری کی سرگرمیاں انجام نہ دے۔ انھوں نے ریاست کو تین دن کا وقت بھی دیاتھا تاکہ وہ جواب دیں کہ حالیہ انہدام کس میونسپل قانون کے مطابق انجام دیا گیا۔ اس کے جواب میں ریاست اتر پردیش نے ایک حلف نامہ داخل کیا کہ کانپور اور پریاگ راج میں حالیہ انہدام مقامی ترقیاتی اتھارٹیز نے اتر پردیش اربن پلاننگ اینڈ ڈیولپمنٹ ایکٹ 1973 کے مطابق کیا گیاہے۔ حکومت نے واضح طور پر اس بات کی تردید کی کہ مسماری کا تعلق فسادات سے تھا۔لیکن سچائی تو یہ ہے کہ حکومت صرف پردہ ڈالنے کی کوشش کررہی ہے ۔
آج عدالت کی شنوائی پر اپنی رائے پیش رکھتے ہوئے صدر جمعیۃ علماء ہند مولانا محمود مدنی نے کہا کہ جس طرح انصاف کرنے کی کوشش جارہی ہے ، وہ خود انصاف کے خلاف بلکہ اس سے بڑھ کر ایک طبقہ کو نشانہ بنانے والا عمل ہے ۔ہم سپریم کورٹ اسی لیے گئے ہیں تا کہ ملک کا آئین اور اس کی حکمرانی قائم رہے ۔انھوں نے کہا کہ مکانات تو ٹوٹتے رہتے ہیں، لیکن ملک اور اس کا آئین نہ ٹوٹے ،یہ ہماری جد وجہد کا مطمح نظر ہے ۔ اور اس کے لیے ہماری جدو جہد بہت طویل عرصے سے جاری ہے اورجاری رہے گی ( ان شاء اللہ )

July 13, 2022

Related Press Releases